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        द्रौपदी कहते थे युध्द जरूरी है, मैने पूछा के क्यों ? समझा दोगे तुम इनको, तुम मे शक्ति है यूं । खेल मैं मुझको लगा गये, जैसे मैं सम्पत्ति हूँ । भूल गए थे वह शायद, के मैं तो पत्नी हूँ। समझ जाते यह बात अगर वो तो,  ये युध्द कभी न होता। मुरली ही सुहती है हाथ मेरे, ये रथ कभी ना होता। बोली चिल्ला कर___ बाँट रहे हो क्यों तुम मुझको, ना मैं धरती हूँ, पंचपवित्र हूँ मैं तो, चीरहरण करते हो क्यों। भरी सभा मैं होरहा था, नारी का अपमान। धरम्पीता हो तुम मेरे, बचलो मेरी लाज। सर झुका कर खड़े है क्यों वह पांडव, जो थे मेरा अभिमान। बोली रोकर द्रौपदी मैं हूँ नारी, करो मरा सम्मान। मुझमें है एक द्रोपदी, द्रौपदी है एक तुझमे भी। जूझती है जिंदगी की कठिनाइयों से, वह तो हर घड़ी।

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